साहित्य में पुष्प-माल्य संस्कृति

Author Name : डाॅ. भरत सिंह
Volume : II, Issue :III,November - 2016
Published on : 2016-11-19 , By : IRJI Publication

Abstract :

विदेशी पुष्पों तथा उनसे बननेवाले उपहार उपकरणों के कारण हमारी धरती में उपजे रंग-विरंगे सुगंधित फूलों की कलात्मक संस्कृति आज समाप्त हो रही है। नाट्यशास्त्र, (23/11) तथा राजनक रुय्यक (सहृदय लीला-2/10) जैसे ग्रंथ एवं विद्वानों के अनुसार हमारे पूर्वज वितत, संघात्य, ग्रत्थिम, प्रलम्बित, मुक्तक, मंजरी तथा स्तवक नाम से नयनाभिराम रंग-विरंगे सुरभित पुष्पों से निर्मित आठ प्रकार की मालाएँ धारण करते थे। पगड़ी, सिर या शरीर के अन्य अंगों पर लपेट कर पहनी जानेवाली पुष्पमाल वेष्टित1, शरीर के एक भाग में फैली विशाल माला वितत नाम से सुख्यात था पुष्प समूहों से ग्रथित संघात्य एवं बीच-बीच में विभिन्न कलियों गाँठों से गुंथी पूर्णरूप से दिखने वाली अवलंबित नाम से ज्ञात थी।